ख़्वाब केवल दिन में हुई घटनाओं की पुनरावृत्ति नहीं हैं. रिसर्च से पता चला है कि दिमाग़ के जिस हिस्से के ज़रिए हम तर्क-वितर्क करते हैं और जिस
हिस्से से हमारे जज़्बात कंट्रोल होते हैं, उन पर ख़्वाब देखने का गहरा असर
होता है. ये कोई नई भाषा सीखने में काफ़ी मददगार होते हैं.
रिसर्च
में पता चला है कि जो छात्र कोई दूसरी नई भाषा सीख रहे होते हैं, वो ख़्वाब
देखने वाली गहरी नींद में ज़्यादा सोते हैं. यानी इस दौरान उन्होंने जो भी
सीखा होता है, वो जानकारी अच्छे से दिमाग़ में जमा होती है. फिर दिन में
हमारा ज़हन इस जानकारी का बेहतर इस्तेमाल कर पाता है.
हमारे ज़हन में नींद के कितने तंतु होते हैं, इसका ताल्लुक़ हमारे
ख़ानदान से होता है. हमारे शरीर की अंदरूनी घड़ी का हिसाब-किताब भी
ख़ानदानी विरासत का नतीजा होता है.
हमारे शरीर की घड़ी हमें बताती
है कि हमें कब सोना है और कब जागना है. नींद के इस चक्र के साथ तालमेल बनाए
रखना ज़रूरी है. तभी हम अपनी अक़्ल का अच्छे से इस्तेमाल कर सकेंगे.
अमरीकी
जीव वैज्ञानिक माइकल डब्ल्यू यंग ने हमारे शरीर के 'क्लॉक जीन' यानी शरीर
की घड़ी चलाने वाले जीन का एक्सपर्ट माना जाता है. इसके लिए उन्हें 2017 में संयुक्त रूप से नोबेल पुरस्कार भी मिला था. यंग कहते हैं कि अच्छी
परफॉर्मेंस के लिए लोग एक लय में काम करना चाहते हैं. फिर वो स्कूल में,
दफ़्तर में हो या फिर ज़िंदगी में कोई और काम.
अब अगर किसी इंसान की
लाइफस्टाइल, आस-पास का माहौल या फिर विरासत में मिली नींद की दिक़्क़त नींद
में ख़लल डालती है, तो इसका सबसे अच्छा तरीक़ा है, कमरे में रात के वक़्त
घुप्प अंधेरा और दिन मे चटख रोशनी करना.
यानी दिन और रात के चक्र
वाला माहौल घर और दफ़्तर में तैयार करना. इससे हमारा ज़हन और शरीर दिन-रात
के फ़र्क़ को समझेंगे और उसी हिसाब से सोने-जागने के लिए तैयार रहेंगे.
बड़े होने पर सीखने की हमारी ताक़त, हमारी बॉडी क्लॉक से बहुत प्रभावित
होती है. ये बात तो हमें पता है. मगर बचपन में भी बॉडी क्लॉक का सीखने की
क्षमता से गहरा नाता होता है.
बड़ों के मुक़ाबले, बच्चे ज़्यादा गहरी
नींद में सोते हैं. यही वजह है कि नई चीज़ें भी वो जल्दी से सीख लेते हैं.
जर्मनी की ट्यूबिनगेन यूनिवर्सिटी में बच्चों की स्लीप लैब है.
इसमें
बच्चों की नींद और सीखने की क्षमता को लेकर रिसर्च चल रही है. लैब में
सोते हुए बच्चों के ज़हन की हरकतों पर निगाह रखी जाती है.
ये जांचा
जाता है कि सोने से पहले और जागने के बाद वो कितनी नई जानकारियां सहेज पाते
हैं. इस रिसर्च से पता चला है कि बच्चे अपनी नींद के दौरान कई नई सीखी हुई
हरकतों को ज़्यादा अच्छे से सहेज पाते हैं. फिर जागने पर दिमाग़ उनका
बेहतर इस्तेमाल करता है.
बड़े भी ऐसा कर सकते हैं. लेकिन, इसके लिए
अच्छी नींद लेना ज़रूरी है. कनाडा के नींद और बॉडी क्लॉक विशेषज्ञ डोमिनिक़
पेटिट कहती हैं कि, 'बच्चों का दिमाग़ विकसित हो रहा होता है, तो नींद का
उनके ज़हन पर ज़्यादा असर होता है. इसीलिए बच्चों को सीखी हुई चीज़ें याद
रखने के लिए दिन में भी सोने की ज़रूरत होती है.'
डोमिनिक़ कहती हैं
कि, 'अगर बच्चे दिन में सोते हैं, तो उन्हें नए शब्द याद करने में मदद
मिलती है. शब्दों के मायने अच्छे से याद होते हैं. नई भाषा वो जल्दी से सीख
जाते हैं. वैसे बचपन हो या युवावस्था या उम्र का कोई और दौर, याददाश्त और
नई चीज़ें सीखने के लिए अच्छी नींद लेना बहुत ज़रूरी है.'
नींद के
दौरान हमारा ज़हन दिन में याद की गई बातों को अच्छे से सहेजता तो है ही,
उन्हें ज़रूरत पड़ने पर तुरंत निकालकर हमें पकड़ा भी देता है. यानी हम इस
याद की हुई नई जानकारी का बेहतर इस्तेमाल तभी कर पाते हैं, जब हम अच्छे से
सो लेते हैं.
यानी नींद हमारी याददाश्त को मज़बूत बनाने का काम करती
है. हमारे पास जो जानकारियां हैं, उनका हम बेहतर इस्तेमाल कर सकें, इसके
लिए भी अच्छी नींद ज़रूरी है.
तो, अगर कोई देर तक सोता है, तो उसे आलसी कह कर ख़ारिज न करें. ये दिमाग़ की लय-ताल के लिए ज़रूरी है.
और हां, जो इम्तिहान की तैयारी कर रहे हैं, वो रतजगा करने के बजाय, रात में अच्छे से सो लें, तो ज़्यादा फ़ायदा होगा.
स्लीप वेल!
हमारे ज़हन में नींद के कितने तंतु होते हैं, इसका ताल्लुक़ हमारे
ख़ानदान से होता है. हमारे शरीर की अंदरूनी घड़ी का हिसाब-किताब भी
ख़ानदानी विरासत का नतीजा होता है.
हमारे शरीर की घड़ी हमें बताती
है कि हमें कब सोना है और कब जागना है. नींद के इस चक्र के साथ तालमेल बनाए
रखना ज़रूरी है. तभी हम अपनी अक़्ल का अच्छे से इस्तेमाल कर सकेंगे.
अमरीकी
जीव वैज्ञानिक माइकल डब्ल्यू यंग ने हमारे शरीर के 'क्लॉक जीन' यानी शरीर
की घड़ी चलाने वाले जीन का एक्सपर्ट माना जाता है. इसके लिए उन्हें 2017
में संयुक्त रूप से नोबेल पुरस्कार भी मिला था. यंग कहते हैं कि अच्छी
परफॉर्मेंस के लिए लोग एक लय में काम करना चाहते हैं. फिर वो स्कूल में,
दफ़्तर में हो या फिर ज़िंदगी में कोई और काम.
अब अगर किसी इंसान की
लाइफस्टाइल, आस-पास का माहौल या फिर विरासत में मिली नींद की दिक़्क़त नींद
में ख़लल डालती है, तो इसका सबसे अच्छा तरीक़ा है, कमरे में रात के वक़्त
घुप्प अंधेरा और दिन मे चटख रोशनी करना.
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